मंगलवार, 17 अगस्त 2010

वो एक नदी थी
शांत,निश्चिन्त,निर्विघ्न ,निर्विकार
अपनी  संवेदनाओं   को   समेटे
अपनी  संभावनाओं को  सहेजे
अनवरत ,अविरल ,बहती हुई
आत्मसंतोष की कथा कहती हुई
एक दिन सागर ने उसे पुकारा
आओ,मेरे पास आ जाओ
मैं  तुम्हारी तन्हाई दूर करूंगा
तुम्हे विस्तार ,फैलाव ,विशालता
और गहराई दूंगा
तुम्हारे अस्तित्व को निखारूंगा 
कुछ  और  सवारूंगा  
नदी को सागर कि बात भा गयी
वो सागर के पास आ गयी
सागर ने उसे अपने में समा लिया
कुछ देर के लिए उसकी लहरों से खेला
फिर उसे अपने में मिला लिया
अपने जैसा बना लिया
कुछ और फैल गया सागर
हो गया कुछ और विशाल
कुछ और विस्तारित
और नदी हो गयी अस्तित्वविहीन.
विस्तार, फैलावऔर गहराई तो  
सागर ने स्वयं रखी   ,अपने लिए 
और नदी को दे दी
बचैनी ,उफान और
कभी न ख़त्म होने वाली हलचल .



1 टिप्पणी:

  1. वाह..लाजवाब रचना है आपकी...हर ताकत वर कमज़ोर का अस्तित्व मिटा देता है...ये बात बहुत ख़ूबसूरती से कही है आपने...खुद्दारी पर कृशन बिहारी नूर साहब का एक लाजवाब शेर है..
    मैं कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है
    हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है

    नीरज

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