शनिवार, 4 सितंबर 2010

कट  गयी  है उम्र लेकिन ,ज़िन्दगानी  रह   गयी
अंत पर तो आ गए, लेकिन  कहानी रह  गयी

कब, किधर, कैसे, कहाँ ,छूटी वो मुझसे   क्या पता
बीच बचपन  और  बुदापे   के , जवानी  रह गयी

बीतेते  ही   जा   रहे   हैं , मौसमों    के    काफिले
पर कहीं कुछ   दूर पर, वो रुत  सुहानी  रह गयी

सोचते   ही  सोचते ,   सदियाँ    गुज़रती    जाएँ    है
और  इन्ही सदियों में उलझी, इक   रवानी रह गयी

बेमुरब्बत था बड़ा  वो , छोड़  कर  मुझको  गया
वक़्त तो लौटा नहीं, उसकी  निशानी   रह  गयी

क्या कहूं ,कितना कहूं ,किससे कहूं ,कैसे  कहूं
बांटने को  ग़म  मेरे, मैं   ही   दिवानी  रह   गयी

5 टिप्‍पणियां:

  1. धन्यवाद दीदी,तुमने हमेशा ही मुझे प्रोत्साहित किया है तुम्हारी प्रशंसा मेरी प्रेरणा रही है धन्यवाद.

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  2. jeevan ke anubhavon ki etni sundar abhivyakti sarahniya hai. Aise hi likhti raho.......

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  3. लेकिन ये ब्लॉग तो बचपन से जवानी में क़दम रख चुका है और अपने पूरे निखार की ओर अग्रसर है ...............अल्लाह करे ज़ोरे -कलम और जियादा .......

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  4. ..बहुत बहुत शुक्रिया लता........

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