शनिवार, 25 सितंबर 2010

गुनगुनी शामों को मुठ्ठी में  दबाये
फिर उन्ही  यादों के पंछी लौट आये

एक  इक कर  जोड़ता है  फिर जतन  से
काट कर जो पर शिकारी ने  उड़ाये

कह दिया नादान  लहरों  ने उन्ही  को
वो जो तूफानों से  कश्ती लेके   आये

भर रहा है दोस्ती का दम वो अब तक
कल मेरे ख़त फाड़ कर जिसने जलाये

जब  कभी  भी हसरतों   ने  सर  उठाया 
मुझको तुम पूछो न कितना याद आये 

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या बात है... इस रचना को पढ़ आनंद आया.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपके लेखन ने इसे जानदार और शानदार बना दिया है....

    उत्तर देंहटाएं