मंगलवार, 25 अगस्त 2015

वो कभी थरथरा के जलती है
तो कभी फड़फड़ा के
कभी भरभरा के जलती है
 तो कभी कंपकंपा के
पर जलती है उसी आन बान  और शान से
जबकि उसे भी मालूम है  की वो
 पिघल पिघल कर ख़त्म हो रही है
उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा
और तब उसके साथ साथ
 उसके चारों तरफ के लोग भी अँधेरे में डूब जाएंगे
पर वो कुछ नहीं कर सकती
ना जलना छोड़ सकती है
ना पिघलने को रोक सकती है
क्योंकि जलना उसका धर्म है
और पिघल कर ख़त्म हो जाना उसकी नियति
एक मोमबत्ती  और कर भी क्या सकती है 

4 टिप्‍पणियां:

  1. क्या खूब लिखा है..!! लाजवाब..!!!

    वक़्त मिले तो हमारे ब्लॉग पर भी आयें|
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in

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  2. बहुत शुक्रिया संजय भास्कर जी

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  3. बहुत शुक्रिया संजय भास्कर जी

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  4. बहुत शुक्रिया संजय भास्कर जी

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