रविवार, 28 अगस्त 2011

 बूढ़े माता पिता से ,
जब विदेश में बसे एकलौते बेटे ने ,
फ़ोन पर  कहा 
तुम्हारे पास आ रहा हूँ 
कुछ समय के लिए
बच्चों को इंडिया घुमाने ,
बताओ तुम लोगों के लिए क्या ले आऊँ 
कुछ भी बताओ
यहाँ सब कुछ मिलता है 
एक  से एक बढ़कर उम्दा और बढ़िया चीज़ें 
बस नाम बताओ ,तुम्हारी बहु पूछ रही है
माँ ने  भरभराई आवाज़ में कहा
हाँ ले आओ बेटा ,
अगर हो सके तो......... ,
थोडा सा हौसला जीने के लिए ,
इन बूढी आँखों के लिए कोई ख्वाब ,
कोई अर्थ इन साँसों के चलने का ,
ले आओ अपने पिता के सूने होठों केलिए 
मुस्कराहट ....
ला कर बिखेर दो इस घर के कोने कोने में 
हमारे प्रश्नों के उत्तर 
इन बूढ़े हाथों को थामने की एक,
सिर्फ एक उंगली 
हो सके तो ले आना 
अपनों की कुछ आहटें 
जो चीर दें हमारे  चारों तरफ फैले सन्नाटे को....
बताओ बेटा तुम ये सब
 ले आओगे ना .....................................

रविवार, 31 जुलाई 2011

एक अनलिखा ख़त मेरा मन 
एक अनकही चाहत मेरी 
वेदनाओं से मिले तसल्ली 
बेचैनी ही राहत मेरी 

अंदर हलचल बाहर मौन
दिल की बातें जाने कौन 
भीटर किसने कब झाँका है 
बाहर से ही बस आँका है 
जितना सोंचू उतनी ही 
 होती है रूह हताहत मेरी
वेदनाओं  से मिले तसल्ली 
बचैनी ही राहत मेरी  

अरमानों के दरवाजों पर 
पहरा देती एक उदासी 
शामों के सुरमई रंग को 
गहरा देती बात ज़रा सी 
रातों को अक्सर हो जाती 
नींदे भी है आहत मेरी
वेदनाओं  से मिले तसल्ली 
बचैनी ही राहत मेरी 

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

रौशनी के समंदर में नहाने वालो ,
तुम्हारे घर के कोने कितने अँधेरे हैं 
हो सके तो घर लौटते वक़्त 
ले जाना
रौशनी की कुछ बूँदें 
और डाल देना घर के 
कोने कोने में  
जो घर को प्रकाशित कर सके 
जिस से घर का तिमिर मर सके 
या खोल देना 
धीरे से 
सूरज की तरफ खुलने वाली 
एक खिड़की
ताकि बाहर का उजाला
 घर में भर सके 


सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

जब शाम गहन छा जाती है
अँधियारा कुछ  गहराता  है
तब  धीरे धीरे मन वीणा  के  तार
कोई सहलाता है

सारा जग निद्रा मगन हुआ
तारों से जगमग गगन हुआ
जब चाँद,  व्योम  से  झांक
चांदनी  झिर झिर झिर बरसाता है
तब धीरे धीरे मन वीणा के तार
कोई सहलाता है

साँसों की सरगम मधुर बजे
इस पल, इस पर हर तान सजे
जब ह्रदय मयूरा झूम झूम के
गीत प्यार के गाता है
तब धीरे धीरे मन वीणा के तार
कोई सहलाता है

वो शीतल मंद बयार चले
गुन गुन भंवरों की कतार चले
जब पुष्प, रंग रस लिए
देख भंवरों को यूँ मुस्काता है
तब धीरे धीरे मन वीणा के तार
कोई  सहलाता है