मंगलवार, 27 अगस्त 2013

उन बुरे लोगों की बुरी नज़र तो
 हमेशा से ही उस  पर रही है 
कभी उसकी  अजन्मी जान पर
 तो  
 कभी उसके  जिस्म के  मकान पर
 उनके नाम  अलग हो सकते हैं  
रूप  और रिश्ते भी  
पर नीयत 
नीयत एक ही है उसके
 जन्मे या अजन्मे अस्तित्व पर 
कुठाराघात।।।।।।। 

शनिवार, 24 अगस्त 2013

मैं लिखती हूँ
हाँ मैं लिखती हूँ
शब्दों में समेट  लेती हूँ
हर वो पल
जो मुझे छू जाता है
वो पल
जो देता है मुझे दर्द,
तकलीफ ,वेदना
आहत  कर जाता है मुझे अंदर तक
लेकिन भूल जाती उन पलों को सहेजना
जो मेरी झोली सुख से भर जाते हैं 

शनिवार, 4 मई 2013

अपनी दीदी के जन्मदिन पर .......................
बड़ा ही शुभ दिन आज,  जगत में मेरी दीदी आयी थी
कितनी खुशियाँ, कितने सपने ,कितनी रौनक लाई थी
मम्मी ने  माँ  बन  कर , नव- ममता का गहना पहना था
पापा आत्मविभोर ,ख़ुशी का उनकी , अब क्या कहना था
बड़े भाई सी बड़ी बहन ,हम भीतर तक  आल्हादित हैं
कुलदीपक  सी कुल्ज्योती हैं  ,हम तो गर्वित ,गर्वित हैं
आज है उनकी सालगिरह ,तो हम तो   यही  मनाएं सभी
स्वस्थ रहें ,दीर्घायु हों ,तन से - मन से  सुख पायें सभी

happy birthday didi...................

बुधवार, 2 जनवरी 2013

थोड़ा सुख थोडा दुःख देके ,गया साल तो चला गया
आओ कदम बड़ा कर देखें ,लाया क्या है साल नया

दिन पर रात ,रात पर दिन का पहरा है ,ये सब जाने
काली कितनी रात हो ,सूरज निकलेगा ,वो कब माने

रहे  उम्मीदें बाकी ,मन  में  रहे  सदा  विश्वास  यही
 अच्छा सोचो अच्छा होगा, जीवन हर दिन  "आस नयी"

आओ अब बाहें फैला के नए साल का स्वागत कर लें
आने वाले इस मेहमां  को, ख़ुशी से अपने माथे- सर लें

नए साल की अनेक शुभकामनाएं .......

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012



अपने पापा के अचानक स्वर्गवास के बाद ........

आहट हुई ना दस्तक ,पापा चले गए
इक देके प्रश्नवाचक , पापा  चले  गए

मन जानता है सच ये ,पर आस की निगाहे
ढूंढे  हैं  उनको  अब  तक  ,पापा  चले  गए

सब कुछ तो जस का तस है ,हम ही बदल गए
लगता  है  सब  निरर्थक  ,पापा  चले  गए

होता नहीं यकीं वो, आयेंगे ना कभी अब
सहलायेंगे ना  मस्तक  ,पापा  चले  गये

जीवन मिला है उनसे ,जीना उन्ही से सीखा
देके  सदा  की  दौलत ,  पापा   चले   गए


रविवार, 23 सितंबर 2012

DAUGHTER'S DAYपर ख़ास ..............

बेटियाँ सिर्फ बेटियाँ कहाँ होती हैं
दो अक्षर में सिमटी सारा जहां होती हैं
तितलियों सी उडती हैं ,खुशबुओं सी बिखरती हैं
 जीवन में भरती हैं नित नए रंग
हमसे ही सीख कर फिर हमें सिखाती हैं
जीने के ढंग
अपनेपन से लुभाती हैं ,अपना बनाती हैं
और हम कमज़ोर पड़े तो
 हमारी ताक़त बन जाती हैं
बेटियाँ तो वो उपलब्धि हैं जो
शब्दों से नहीं भावों से बयाँ होती हैं
बेटियाँ सिर्फ बेटियाँ कहाँ होती हैं 

पराये घर जाकर भी जो सुन लेती हैं
मां की ख़ामोशी
सहलाती हैं पिता का बुढ़ापा
पहचानती है उनका हर दर्द
पढ़ लेती है उनके आँखों की मूक भाषा
 वो हर दिन ,हर पल,
अपनी खुशबू,यादों और इरादों से
उनके साथ होती हैं
कौन कहता है कि बेटियाँ
सिर्फ कुछ दिनों की मेहमां होती हैं
बेटियाँ सिर्फ बेटियाँ कहाँ होती हैं 

कभी लोरियां
तो कभी चांदी की कटोरियाँ
बन कर गुदगुदाने वाली बेटियाँ
वक़्त आने पर जब
मां के हाथों को थाम
उनके कमज़ोर पैर के नीचे का आधार बनती हैं
तो हो जाती हैं ज़मीन
और जब
पिता के सीने में गर्व बन
उन्हें ऊंचा उठा देती है तो आसमां होती हैं
बेटियाँ सिर्फ बेटियाँ कहाँ होती हैं 

बुधवार, 16 मई 2012

सोचो ,समझो,परखो,जानो 
सच को यूँही सच मत मानो 

जीने के अंदाज़ बहुत हैं 
जीने का फन तो पहचानो 

मैं तो खुद हूँ एक कहानी 
मुझसे मत उलझो अफसानो 

इस पर ,उस पर सब पर नज़रें 
खुद को भी देखो नादानों


सब के बन कर मुझ तक आते 
दूर रहो मुझसे एहसानों