गुरुवार, 14 मई 2020

हमेशा ही रही हूँ ख़ुद से मैं एक अजनबी बन के
प मन करता है अब रह जाऊँ बस अपनी सखी बन के

कभी झरना कभी बूंदें कभी सागर सी लहराऊँ
बुझाने प्यास सबकी रह गयी मीठी नदी बन के

हंसू अपने ही संग खेलूं सुनाऊं खुद को मैं किस्से
कभी रूठूँ कभी खिल जाऊँ मैं अल्हड़ हंसी बन के

वो बातें जो बरस बरसों में हो न पायीं हैं अब तक
उन्हें लम्हों में मैं जी लूँ खुशी की इक सदी बन के

मिले मुझको नहीं तुम ज़िन्दगी में क्यों करूं शिकवा
मेरे भीतर तो तुम ही रह रहे हो ज़िन्दगी बन के

अर्चना जौहरी

शनिवार, 16 नवंबर 2019

कैसे जियें ये जिंदगी,  कुछ भी पता नहीं
वहशी ये हैं या आदमी ,कुछ भी पता नहीं

आती रही है आएगी हर दिन नई सुबह
क्या मिट सकेगी तीरगी, कुछ भी पता नहीं

हर दिन नया फैशन,नए जलवे, नये है रूप
खोयी कहाँ है सादगी,  कुछ भी पता नहीं

आँखों की कोर पे ये जो ठहरा हुआ है अश्क़
यादें हैं या है बेबसी,   कुछ भी पता नहीं

उसने  मेरे ग़मों को हंसी में उड़ा दिया
वो प्यार था या दिल्लगी,कुछ भी पता नहीं

मंगलवार, 7 अगस्त 2018


करे  वो  गर्व  अपने  पर, कि जो हिन्दोस्तानी है
बचाना है अगर  ये  देश, तो  हिंदी  बचानी  है
हुए आज़ाद  अंग्रेजों से,  सत्तर साल  पहले  फिर 
क्यूँ हिंदी अब भी दासी और इंग्लिश दिल की रानी है

अगर हिंदी में हम बोलें, हमें  क्यूँ  शर्म  आती है
भले टूटी ही  फूटी  हो,   मगर  इंग्लिश ही  भाती है
कि उसके घर में ही मिलता नहीं उसको कोई आदर
भले  इंग्लिश  ग़लत  बोले  नहीं  हिंदी  सुहाती  है
की बरसों से यहाँ हिंदी की बस ये  ही  कहानी   है  

बना के  इसको status का symbol मूँद लीं आँखें
है भाषाओं की रानी घर में पर हम घर में क्यूँ झांकें
रहे रोती, सिसकती, हो  तिरस्कृत  बीच  में  सबके
की जो हो बोलता इंग्लिश में, उसको  ही  बड़ा आंकें
की अब सारी ही दुनिया सिर्फ इंग्लिश की दीवानी है

 हो कुछ ऐसा कि हम हिंदी में बोलें  और हों गर्वित
औ हिंदी  की ये बिंदी  देश के माथे पे हो शोभित
बनाए दिल की भाषा हम करें अभिव्यक्त हिंदी में
सुनें, बोले, औ सोचें  हर जगह हर वक़्त हिंदी में
की घर,स्कूल,दफ्तर  हर  जगह हिंदी ही लानी है

अगर है मात्रभाषा तो  बने  फिर  राष्ट्रभाषा  ये
सजेगी हिंदी हर लब पे,  हमें  पूरी  है आशा ये
कि हमने ठान ली है हिंदी को हम ले  के आयेंगे
औ छट जाएगा  हिंदी पर से सदियों का कोहासा ये
नहीं कागज़ पे,दिल  में भी ये हिंदी मुस्करानी है  





रविवार, 1 मई 2016

क्या करूँ मैं कि दिल से सुकूँ आ मिले  
कि शुरू हों कोई तो नए सिलसिले

ज़िन्दगी जा रही,कुछ ना कर पा रही
कैसे पकडूं मैं जाते हुए हौसले

क्या था करना मुझे क्या मैं करती रही
खुद से खुद को ही देती रही फासल

रात जाती भी है सुबह  आती भी है
मेरे अंदर जो है रात वो तो ढले

एक मुसलसल सफ़र और ना साथी कोई
खोये रस्ते में ही सारे जो भी मिले

ज़िंदगी भी अजब एक कहानी है ये

उतनी खुशियाँ भी देती है जितने गिले 

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

जबसे मुझको मुस्कराना आ गया है
जश्न साँसों का मनाना आ गया है

देख कर सच्चाई के संग हौसले को
झूठ को अब मुंह छुपाना आ गया है

मुद्दतों, सहमी हुई सी  औ घुटी सी
ज़िन्दगी को खिलखिलाना  आ गया है

राहे मंजिल पे रुकें अब पाँव क्यूँकर
मुझको काँटों से निभाना आ गया है

अब मुहब्बत की कमी कोई ना होगी
दोस्त दुश्मन को बनाना आ गया है

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

कौन किसी का अब होता है
मतलब से ही सब होता

पहले अर्पण करना पड़ता
झोली भरना तब होता है

कुछ रिश्ते मतलब के होते
पर कुछ का मतलब होता है

अश्क,उदासी ,ख़ुशी,कहकहे 
इनका एक सबब होता है 

लगता वो भगवान् किसी को 
और किसी का रब  होता है

कल की चिंता क्यूँ हो आखिर
चिंता से कुछ कब होता है

कब क्यूँ कैसे ,ये ना सोचो 
होने  दो जो जब  होता है



मंगलवार, 25 अगस्त 2015

वो कभी थरथरा के जलती है
तो कभी फड़फड़ा के
कभी भरभरा के जलती है
 तो कभी कंपकंपा के
पर जलती है उसी आन बान  और शान से
जबकि उसे भी मालूम है  की वो
 पिघल पिघल कर ख़त्म हो रही है
उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा
और तब उसके साथ साथ
 उसके चारों तरफ के लोग भी अँधेरे में डूब जाएंगे
पर वो कुछ नहीं कर सकती
ना जलना छोड़ सकती है
ना पिघलने को रोक सकती है
क्योंकि जलना उसका धर्म है
और पिघल कर ख़त्म हो जाना उसकी नियति
एक मोमबत्ती  और कर भी क्या सकती है